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‘द लास्ट क्राई’ की गूंज से सहरसा का मंच हुआ पर्यावरणमय, छपरा इप्टा की प्रस्तुति ने जीता दर्शकों का दिल, कलाकारों के अभिनय और रंग-संगीत की जमकर सराहना

सहरसा, 3 अक्टूबर। बिहार इप्टा राज्यस्तरीय नाट्योत्सव 2026 ‘सच का रंगमंच : रंगों और विचारों का उत्सव’ के दूसरे दिन छपरा इप्टा ने सीपीएस, छपरा के सहयोग से पर्यावरण केंद्रित नाटक ‘द लास्ट क्राई’ की ऐसी प्रभावशाली प्रस्तुति दी कि पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। नाटक के संदेश, संवाद अदायगी, मंझे हुए अभिनय, रंग-संगीत, प्रकाश परिकल्पना और खूबसूरत ब्लॉक्स ने प्रस्तुति को यादगार बना दिया।

नाटक में सूत्रधार समृद्धि श्रेया ने अपनी सधी हुई संवाद अदायगी, मंच पर आत्मविश्वास और भाव-भंगिमाओं से कथा को प्रभावशाली ढंग से आगे बढ़ाया। उनकी प्रस्तुति ने दर्शकों को शुरुआत से अंत तक नाटक से जोड़े रखा। वहीं प्रीति कुमारी ने ‘धरती’ के रूप में पर्यावरणीय पीड़ा को अपने अभिनय में जिस संवेदनशीलता से उतारा, वह प्रस्तुति के सबसे प्रभावशाली पक्षों में रहा। उनके अभिनय में धरती की कराह, आक्रोश और मनुष्य से सवाल करती चेतना स्पष्ट दिखाई दी।

युवराज सिंह ने ‘विकास’ की भूमिका में आधुनिक विकास की उस विडंबना को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा, जो प्रगति की दौड़ में प्रकृति के विनाश को नजरअंदाज कर देती है। उनका अभिनय नाटक के वैचारिक संघर्ष को धार देता दिखाई दिया।

अनुभव सिंह ने ‘वृक्ष’, शगुन सिंह ने ‘पक्षी’, आर्यन कुमार सिंह ने ‘पहाड़’, स्मृति गौतम ने ‘हवा’ और रिया शर्मा ने ‘नदी’ के रूप में प्रकृति के विभिन्न रूपों को जीवंत कर दिया। इन पात्रों ने संवादों के साथ अपनी देहभाषा और मंचीय उपस्थिति से पर्यावरण संकट को दृश्यात्मक प्रभाव दिया।

विराट कुमार सिंह ने ग्रामीण, जज, काका और कोरस की विभिन्न भूमिकाओं में अपनी बहुआयामी अभिनय क्षमता दिखाई। राजन गुप्ता ने युवक और श्रेया सिंह ने युवती की भूमिका में सहज अभिनय किया, जबकि अश्विनी सिंह ने मां के किरदार में भावनात्मक गहराई पैदा की। वंशिका ने बच्चे और गरिमा कुमारी ने महिला की भूमिका को प्रभावशाली ढंग से निभाया।

कोरस में आदित्य कुमार गुप्ता, आकृति कुमारी वर्मा, खुशी कुमारी, आराध्या सिंह और श्रुति कुमारी ने सामूहिक स्वर, लय और मंचीय ऊर्जा से नाटक के दृश्यों को जीवंत बनाया। पूरी टीम के सामूहिक अभिनय में अनुशासन, ऊर्जा और मंच के प्रति प्रतिबद्धता स्पष्ट नजर आई।

नाटक के रंग-संगीत ने प्रस्तुति की संवेदना को नई ऊंचाई दी। हिमांशु कुमार राय ने सिंथेसाइजर, शैलेन्द्र कुमार शाही ने हारमोनियम, विनय कुमार ‘बीनू जी’ ने नाल, मानिक कुमार ने ड्रम तथा आयुष कुमार मान ने झाल-खंजड़ी के माध्यम से मंच पर ऐसा वातावरण रचा, जिसने दृश्यों के प्रभाव को कई गुना बढ़ा दिया।

नाटक का सबसे उज्जवल पक्ष कंचन बाला का रंग संगीत रहा। शैलेन्द्र कुमार शाही और शालिनी कुमारी के सह-निर्देशन तथा विनय कुमार के सह-निर्देशन संगीत ने प्रस्तुति को मजबूत आधार दिया। रंगकर्मी रितेश रंजन की प्रकाश परिकल्पना ने नाटक को प्रेषणीय बनाया।

लेखन, निर्देशन एवं रंग-परिकल्पना डॉ० अमित रंजन की रही। उनकी रंग-दृष्टि में तैयार ‘द लास्ट क्राई’ ने मनोरंजन के साथ पर्यावरण विनाश के गंभीर सवाल को दर्शकों के सामने तीखे ढंग से रखा।

प्रस्तुति समाप्त होते ही कलाकारों का उत्साह देखते ही बनता था। एक-दूसरे को बधाई देते कलाकारों के चेहरों पर सफल प्रस्तुति और जीत का उल्लास साफ झलक रहा था। दर्शकों की लगातार तालियों ने किशोर रंगकर्मियों की मेहनत का उत्साह और बढ़ा दिया।

‘द लास्ट क्राई’ केवल एक नाटक नहीं, बल्कि धरती की उस पुकार का रंगमंचीय रूप बनकर सामने आया, जिसे सुनना अब पूरी मानवता की जिम्मेदारी है। छपरा इप्टा की इस प्रस्तुति ने सहरसा में यह संदेश भी दिया कि नई पीढ़ी का रंगमंच सवाल पूछना और समाज को आईना दिखाना जानता है।

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