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प्रेमचंद का साहित्य अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की मशाल, आज भी उतना ही प्रासंगिक : प्रो. वीरेन्द्र नारायण यादव

समारोह का एक विशेष आकर्षण अधिवक्ता, पत्रकार एवं रंगकर्मी डॉ. अमित रंजन के ग़ज़ल, कविता और गीत संग्रह ‘मौसिकी : अहसासों का आसमान’ के ई-बुक संस्करण का लोकार्पण रहा। हिन्दी के मूर्धन्य विद्वान एवं बिहार विधान परिषद सदस्य प्रो. (डॉ.) वीरेन्द्र नारायण यादव ने पुस्तक का विधिवत लोकार्पण करते हुए कहा कि समकालीन हिन्दी साहित्य में संवेदना और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रचनाओं की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है और यह कृति उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। इस अवसर पर डालसा के सचिव राजीव कुमार, इप्टा के सचिव शैलेन्द्र कुमार शाही सहित अनेक साहित्यकारों एवं गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति ने इस क्षण को और भी गरिमामय बना दिया।

 “इप्टा की विचार गोष्ठी में प्रेमचंद की जनपक्षधर चेतना पर हुआ गंभीर विमर्श

“डॉ. अमित रंजन के ग़ज़ल संग्रह ‘मौसिकी : अहसासों का आसमान’ के ई-बुक संस्करण का हुआ लोकार्पण”

छपरा। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती के अवसर पर “समकालीन परिप्रेक्ष्य में प्रेमचंद के विचारों की प्रासंगिकता” विषय पर इप्टा, छपरा के तत्वावधान में रामजयपाल महाविद्यालय परिसर स्थित लक्ष्मी नारायण यादव अध्ययन केन्द्र में एक गरिमामय विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। साहित्यकारों, शिक्षाविदों, न्यायिक पदाधिकारियों, रंगकर्मियों और साहित्यप्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रेमचंद के साहित्य की सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक प्रासंगिकता पर गंभीर विमर्श हुआ।

मुख्य वक्ता बिहार विधान परिषद सदस्य एवं हिन्दी के मूर्धन्य विद्वान प्रो. (डॉ.) वीरेन्द्र नारायण यादव ने कहा कि “जब तक समाज में शोषण, दमन, अत्याचार, विषमता और सांप्रदायिकता जैसी अमानवीय प्रवृत्तियाँ विद्यमान रहेंगी, तब तक मुंशी प्रेमचंद अपने साहित्य के माध्यम से हमारे समय के सबसे प्रासंगिक लेखक बने रहेंगे।” उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने सोज़-ए-वतन, पंच परमेश्वर, नमक का दारोगा, ठाकुर का कुआँ, कफ़न, गबन और गोदान जैसी कालजयी रचनाओं के माध्यम से भारतीय समाज में सामाजिक न्याय, राष्ट्रीय चेतना और मानवीय मूल्यों की मशाल प्रज्वलित की। उनका साहित्य केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और सामाजिक परिवर्तन का वैचारिक दस्तावेज़ है।

विषय प्रवेश कराते हुए अधिवक्ता, पत्रकार, साहित्यकार एवं रंगकर्मी डॉ. अमित रंजन ने कहा कि प्रेमचंद केवल कथा-साहित्य के शिल्पी नहीं, बल्कि भारतीय समाज के सबसे बड़े सांस्कृतिक इतिहासकार हैं। उन्होंने साहित्य को जनजीवन के संघर्षों से जोड़ते हुए किसान, मजदूर, स्त्री, दलित और वंचित वर्गों की पीड़ा को केंद्र में रखा। डॉ. रंजन ने कहा कि आज जब समाज बाज़ारवाद, असमानता और संवेदनहीनता के दौर से गुजर रहा है, तब प्रेमचंद का साहित्य लोकतांत्रिक मूल्यों, सामाजिक न्याय और मानवीय करुणा की सबसे विश्वसनीय आवाज़ बनकर सामने आता है।

इप्टा, छपरा के अध्यक्ष सुरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य सांस्कृतिक प्रतिरोध की सबसे सशक्त परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा कि इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा भी प्रेमचंद की जनपक्षधर चेतना और प्रगतिशील दृष्टि से निरंतर प्रेरणा ग्रहण करती रही है। साहित्य और रंगमंच का उद्देश्य समाज में संवेदनशीलता, समानता और न्याय की चेतना को मजबूत करना है।

प्रो. पृथ्वीराज सिंह ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य भारतीय लोकतंत्र की आत्मा और सामाजिक समरसता का आधार है। उनकी रचनाएँ मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखने की दृष्टि देती हैं तथा अन्याय और भेदभाव के विरुद्ध खड़े होने का नैतिक साहस प्रदान करती हैं।

डॉ. दिनेश पाल ने प्रेमचंद की चर्चित कहानी ‘मृतक भोज’ का विश्लेषण करते हुए कहा कि यह कहानी आज भी सामाजिक आडंबर, आर्थिक शोषण और रूढ़िवादिता पर उतनी ही प्रखर चोट करती है, जितनी अपने समय में करती थी। उन्होंने कहा कि समय बदलने के बावजूद प्रेमचंद की रचनाओं की प्रासंगिकता और भी अधिक गहरी हुई है।

इस अवसर पर अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी राजीव कुमार ने कहा कि प्रेमचंद के आदर्शों को केवल पढ़ने की नहीं, बल्कि जीवन में उतारने की आवश्यकता है। अरविंद यादव ने कफ़न तथा सुरेंद्र सिंह ने नमक का दारोगा के माध्यम से प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि और यथार्थबोध को रेखांकित किया। सारण जिला जदयू के अध्यक्ष बैजनाथ सिंह विकल ने प्रेमचंद को आधुनिक भारतीय साहित्य की सबसे बड़ी धरोहर बताते हुए उन्हें “कलम का जादूगर” कहा।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. (डॉ.) लालबाबू यादव ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि प्रेमचंद हाशिए पर खड़े समाज की आवाज़ हैं। उनका साहित्य सामाजिक न्याय, मानवीय गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज़ है।

कार्यक्रम में डॉ. श्याम शरण, विद्यासागर विद्यार्थी, युवा सामाजिक कार्यकर्ता प्रिंस राज, डॉ. अनिल कुमार, सुमन जी, ओमप्रकाश शर्मा सहित अनेक शिक्षाविदों, साहित्यकारों एवं रंगकर्मियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम का प्रभावी एवं गरिमामय संचालन डॉ. अमित रंजन एवं डॉ. दिनेश पाल ने संयुक्त रूप से किया। अंत में इप्टा के सचिव शैलेन्द्र कुमार शाही ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर इप्टा के उपाध्यक्ष बबुआ नन्द द्विवेदी, सचिव शैलेन्द्र कुमार शाही तथा बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी, शिक्षाविद, अधिवक्ता, रंगकर्मी एवं साहित्यिक अभिरुचि वाले नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन प्रेमचंद की मानवीय, प्रगतिशील और जनवादी चेतना को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ।

‘मौसिकी : अहसासों का आसमान’ के ई-बुक संस्करण का लोकार्पण

समारोह का एक विशेष आकर्षण अधिवक्ता, पत्रकार एवं रंगकर्मी डॉ. अमित रंजन के ग़ज़ल, कविता और गीत संग्रह ‘मौसिकी : अहसासों का आसमान’ के ई-बुक संस्करण का लोकार्पण रहा। हिन्दी के मूर्धन्य विद्वान एवं बिहार विधान परिषद सदस्य प्रो. (डॉ.) वीरेन्द्र नारायण यादव ने पुस्तक का विधिवत लोकार्पण करते हुए कहा कि समकालीन हिन्दी साहित्य में संवेदना और सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रचनाओं की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है और यह कृति उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। इस अवसर पर डालसा के सचिव राजीव कुमार, इप्टा के सचिव शैलेन्द्र कुमार शाही सहित अनेक साहित्यकारों एवं गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति ने इस क्षण को और भी गरिमामय बना दिया।

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