छपरा इप्टा के ‘द लास्ट क्राई’ की प्रथम प्रस्तुति ने छोड़ी गहरी छाप, सहरसा नाट्योत्सव के लिए किशोर रंगकर्मियों ने कसी कमर
छपरा, 24 सितंबर। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की जयंती के अवसर पर छपरा इप्टा द्वारा सेंट्रल पब्लिक स्कूल (CPS), चाँदमारी के सहयोग से विद्यालय के ऑडिटोरियम में रामधारी सिंह दिनकर जयंती सह नाटक ‘द लास्ट क्राई’ की प्रथम/पूर्वाभ्यास प्रस्तुति आयोजित की गई। कार्यक्रम का उद्घाटन जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश श्री राघवेन्द्र विक्रम सिंह, डालसा सचिव राजीव कुमार, गंगा सिंह कॉलेज के प्राचार्य प्रो. प्रमेन्द्र रंजन सिंह तथा वरिष्ठ रंगकर्मी-पत्रकार प्रो. लाल बाबू यादव, मनोज कुमार वर्मा संकल्प, डॉ० मकेश्वर चौधरी, डॉ० नेहा पाण्डेय, सुरेन्द्र त्रिपाठी, डॉ० हरेंद्र सिंह, अधिवक्ता बबुआनन्द द्विवेदी आदि ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया।
अतिथियों ने दिनकर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि दिनकर का साहित्य केवल राष्ट्र और सामाजिक चेतना का स्वर नहीं, बल्कि अन्याय और विसंगतियों के विरुद्ध मनुष्य को जागृत करने वाली ऊर्जा भी है।

इसके बाद ‘बिहार इप्टा राज्यस्तरीय नाट्योत्सव 2026—‘सच का रंगमंच: रंगों और विचारों का उत्सव’, 2 से 4 अक्टूबर तक सहरसा में आयोजित होने वाले नाट्योत्सव में 3 अक्टूबर को छपरा इप्टा की प्रस्तुति के मद्देनजर ‘द लास्ट क्राई’ का प्रथम मंचन किया गया।
प्रकृति की पीड़ा को किशोर रंगकर्मियों ने दी आवाज
डॉ. अमित रंजन द्वारा लिखित, निर्देशित एवं रंग परिकल्पित इस नाटक में पर्यावरणीय संकट को मानवीय संवेदना और रंगभाषा के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया गया है। नाटक में प्रकृति के विभिन्न तत्वों—धरती, हवा, नदी, पहाड़, वृक्ष और पक्षी—को मानवीय स्वर देकर पर्यावरण के लगातार बिगड़ते संतुलन और उसके भविष्य पर पड़ने वाले प्रभावों को रेखांकित किया गया है।
इन किशोर रंगकर्मियों की रही भागीदारी
निर्देशक अमित रंजन ने कथ्य को उपदेशात्मक बनाने के बजाय प्रतीक, संवाद, सामूहिक अभिनय और मंचीय गतिशीलता के जरिए प्रस्तुत किया है। खास बात यह रही कि मंच पर अधिकांश कलाकार किशोर रंगकर्मी हैं।
जिनमें समृद्धि श्रेया और समर प्रताप सिंह ने सूत्रधार की भूमिका में कथा को आगे बढ़ाने का महत्वपूर्ण दायित्व निभाया। युवराज सिंह ने विकास की भूमिका को बेहतरीन ढ़ंग से मंच पर प्रस्तुत कर वाह वाही लूटी। ग्रामीण/जज/ काका की भूमिका में विराट कुमार सिंह का अभिनय विशेष रूप से कथ्य को सामाजिक धरातल से जोड़ता है, जबकि वृक्ष (अभिनव कुमार सिंह), पक्षी (शगुन सिंह), धरती (प्रीति कुमारी), हवा (स्मृति गौतम), नदी (रिया शर्मा) और पहाड़ (आर्यन कुमार सिंह) के रूप में किशोर कलाकारों ने प्रकृति के मानवीकरण को प्रभावी बनाया। माँ बेटा भावनात्मक संबंधों को अश्विनी सिंह और श्रुति कुमारी ने भरपूर आयाम दिया। युवक और युवती की भूमिका में राजन गुप्ता और श्रेया सिंह ने निटकीय कथ्य को उभारा। सामूहिक दृश्यों में कोरस (आदित्य कुमार गुप्ता, आकृति कुमारी वर्मा, खुशी कुमारी, आराध्या सिंह, वंशिका) और नाद से मानिक कुमार की भागीदारी ने प्रस्तुति को दृश्यात्मक विस्तार दिया।
समाजी के रुप में शैलेन्द्र कुमार शाही, विनय कुमार ‘बीनू जी’, मनिक कुमार और आयुष कुमार मान ने अपने अनुभव से किशोर कलाकारों की प्रस्तुति को मजबूती दी। नाटक के संगीत पक्ष की जिम्मेदारी कंचन बाला ने संभाली है, जबकि मंच पर संगीत और अभिनय का संयोजन प्रस्तुति के भावात्मक प्रभाव को बढ़ाता है।
निर्देशन में संदेश से अधिक संवाद पर जोर
डॉ. अमित रंजन के निर्देशन में नाटक का केंद्रीय सवाल—विकास की दौड़ में प्रकृति के अस्तित्व का क्या होगा?—लगातार दर्शकों के सामने बना रहता है। मंच पर पेड़, नदी, पहाड़, हवा और धरती जैसे पात्रों को जीवंत करने का प्रयोग नाटक की विशिष्टता है। हालांकि पूर्वाभ्यास प्रस्तुति होने के कारण कुछ दृश्यों में संवाद की गति, प्रकाश और मंचीय संक्रमण को और कसने की गुंजाइश दिखाई दी, लेकिन किशोर कलाकारों की ऊर्जा और विषय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता प्रस्तुति की बड़ी ताकत रही।
प्रस्तुति के बाद रंगकर्मियों, अतिथियों और दर्शकों ने नाटक पर विस्तृत चर्चा की तथा सहरसा में होने वाली प्रस्तुति के लिए आवश्यक सुझाव दिए।
कार्यक्रम का संचालन कंचन बाला ने किया। अध्यक्षता छपरा इप्टा अध्यक्ष सुरेन्द्र नाथ त्रिपाठी और CPS के चेयरमैन डॉ. हरेन्द्र सिंह ने संयुक्त रूप से की। सह-निर्देशक शैलेन्द्र कुमार शाही एवं शालिनी कुमारी, सह-निर्देशक संगीत विनय कुमार, प्रस्तुति प्रबंधक डॉ० विकास कुमार सिंह, पूर्वाभ्यास प्रभारी बबुआनन्द द्विवेदी, लाइट, माइक एवं प्रॉप्स आयुष कुमार तथा प्रस्तुति नियंत्रण में प्रो. (डॉ.) वीरेन्द्र नारायण यादव, एमएलसी, सुरेन्द्र नाथ त्रिपाठी एवं डॉ. हरेन्द्र सिंह की भूमिका रही।
सहरसा में 3 अक्टूबर को होने वाली प्रस्तुति के पहले छपरा में हुआ यह मंचन महज पूर्वाभ्यास नहीं, बल्कि किशोर रंगकर्मियों द्वारा पर्यावरण के सवाल को रंगमंच की आवाज देने की एक सार्थक पहल के रूप में सामने आया।



