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इप्टा के 84वें स्थापना दिवस पर “जन संस्कृति दिवस” समारोह आयोजित, “इप्टा की जन संस्कृति और युद्ध की विभीषिका” विषय पर हुई विचार गोष्ठी एवं जनगीतों की प्रस्तुति

इप्टा के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ० अमित रंजन ने विषय प्रवेश कराया। उन्होंने कहा कि इप्टा की स्थापना ऐसे दौर में हुई थी जब दुनिया युद्ध, साम्राज्यवाद और फासीवाद की त्रासदी से जूझ रही थी। आज भी विश्व के विभिन्न हिस्सों में युद्ध और हिंसा मानवता के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। ऐसे समय में जन संस्कृति और जनपक्षधर कला की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

छपरा 25 मई 2026। भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के 84वें स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित “जन संस्कृति दिवस” समारोह के तहत “इप्टा की जन संस्कृति और युद्ध की विभीषिका” विषय पर एक गंभीर एवं सार्थक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ रंगकर्मी, संगीत निर्देशक, अभिनेत्री एवं वरिष्ठ इप्टाकर्मी कंचन बाला ने की, जबकि संचालन इप्टा के सचिव शैलेन्द्र कुमार शाही ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए इप्टा के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ० अमित रंजन ने विषय प्रवेश कराया। उन्होंने कहा कि इप्टा की स्थापना ऐसे दौर में हुई थी जब दुनिया युद्ध, साम्राज्यवाद और फासीवाद की त्रासदी से जूझ रही थी। आज भी विश्व के विभिन्न हिस्सों में युद्ध और हिंसा मानवता के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं। ऐसे समय में जन संस्कृति और जनपक्षधर कला की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

सहायक सचिव विजय शंकर ने अपने वक्तव्य में कहा कि इप्टा ने हमेशा कला को जनता के संघर्षों से जोड़ा है। उन्होंने कहा कि संस्कृति का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज में मानवीय चेतना और प्रतिरोध की भावना को मजबूत करना भी है।

सहायक सचिव शालनी कुमारी ने कहा कि युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, उसका दुष्प्रभाव आम जनता, महिलाओं और बच्चों के जीवन पर भी पड़ता है। जन संस्कृति इन पीड़ाओं को स्वर देने का कार्य करती है।

श्रुति गुप्ता ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इप्टा की सांस्कृतिक परंपरा नई पीढ़ी को लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों से जोड़ने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि गीत, नाटक और साहित्य समाज में संवेदना जगाने की ताकत रखते हैं।

इप्टा सचिव शैलेन्द्र कुमार शाही ने कहा कि जन संस्कृति हमेशा शांति, भाईचारे और सामाजिक न्याय की पक्षधर रही है। उन्होंने कहा कि आज जरूरत है कि सांस्कृतिक आंदोलन को और व्यापक बनाया जाए ताकि समाज में नफरत और हिंसा के खिलाफ सकारात्मक माहौल तैयार हो सके।

उपाध्यक्ष बबुआनन्द द्विवेदी तथा अध्यक्ष सुरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने भी विषय पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि इप्टा की विरासत जनसंघर्षों और मानवीय मूल्यों की विरासत है, जिसे आगे बढ़ाना समय की मांग है।

भाकपा राज्य परिषद सचिव मण्डल सदस्य सुरेन्द्र सौरभ ने अपने संबोधन में कहा कि इप्टा ने हमेशा जनपक्षधर सांस्कृतिक आंदोलन को मजबूत करने का कार्य किया है। उन्होंने कहा कि युद्ध और साम्राज्यवादी ताकतें दुनिया में भय, असमानता और विनाश का माहौल पैदा करती हैं, जबकि जन संस्कृति इंसानियत, शांति और सामाजिक एकता का संदेश देती है। उन्होंने सांस्कृतिक कर्मियों से समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों और भाईचारे को मजबूत करने की अपील की।

अंत में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए कंचन बाला ने कहा कि कला और संस्कृति समाज को जोड़ने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि युद्ध और हिंसा मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं तथा कलाकारों और सांस्कृतिक कर्मियों की जिम्मेदारी है कि वे शांति, प्रेम और इंसानियत के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद करें।

विचार गोष्ठी के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें कंचन बाला, शालनी कुमारी, श्रुति गुप्ता और शैलेन्द्र कुमार शाही द्वारा इप्टा गीत एवं जनगीतों की प्रभावशाली प्रस्तुति की गई। प्रस्तुत गीतों में “तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत पर यकीन कर”, “कहब त लाग जाई धक से”, “जनता के आवे पलटनिया हिलेला झकझोर दुनिया” तथा “फिर नये संघर्ष का न्योता मिला है” जैसे जनगीत शामिल रहे। गीतों की प्रस्तुति ने उपस्थित श्रोताओं में जनचेतना, संघर्ष और सामाजिक प्रतिबद्धता का उत्साह भर दिया।

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