छपरा। अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त उर्दू शायर डॉ. बशीर बद्र के निधन पर राहत रोड, करीम चक स्थित डॉ. मोअज्जम के आवास पर एक शोक सभा का आयोजन किया गया। सभा की अध्यक्षता अल्हाज निहाल अहमद ने की। इस अवसर पर उपस्थित साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और शायरी प्रेमियों ने दिवंगत शायर को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की तथा उनके साहित्यिक योगदान को याद किया।
सभा को संबोधित करते हुए डॉ. अज़्म ने कहा कि बशीर बद्र का कलाम अपने दौर की सबसे नायाब शायरी में शुमार किया जाता है। उन्होंने कहा कि उनकी शायरी में नए और अनोखे शब्दों का प्रयोग जिस खूबसूरती से मिलता है, वह अन्य शायरों में दुर्लभ है। उन्होंने बशीर बद्र के मशहूर शेर—
“कोई फूल धूप की पत्तियों में हरे रिबन से बंधा हुआ,
वो ग़ज़ल का लहजा नया नया, न कहा हुआ न सुना हुआ”
—का उल्लेख करते हुए उनकी रचनात्मकता को याद किया।
प्रो. शमीम परवेज ने कहा कि बशीर बद्र के निधन से उर्दू शायरी के उस स्वर्णिम दौर का अंत हो गया, जो अपने आधुनिक और विशिष्ट लहजे के लिए जाना जाता था। उन्होंने उन्हें इन पंक्तियों के माध्यम से श्रद्धांजलि दी—
“लोग हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं,
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में।”
अध्यक्षीय संबोधन में अल्हाज निहाल अहमद ने कहा कि बशीर बद्र के जाने से शायरी की दुनिया में एक ऐसा खालीपन पैदा हो गया है, जिसकी भरपाई संभव नहीं है। वहीं डॉ. शहज़ाद आलम ने कहा कि डॉ. बशीर बद्र छपरा में आयोजित होने वाले ऑल इंडिया मुशायरों में अक्सर शिरकत करते थे और उनकी मौजूदगी से मुशायरे यादगार बन जाया करते थे। उन्होंने बशीर बद्र का प्रसिद्ध शेर—
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
—सुनाकर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
शोक सभा में अल्हाज डॉ. सैयद मुश्ताक अहमद, डॉ. मजहर किबरिया, डॉ. अब्दुल समद, मो. तैयब हुसैन एडवोकेट, मुहम्मद हाशिम, नेयाज अहमद, अब्दुल कलाम, मुसर्रत कमाल, अली अब्बास, शकील अनवर, अनवार आलम, शाहिद जमाल, नदीम अहमद, शमशीर आलम सहित अन्य गणमान्य लोगों ने भी डॉ. बशीर बद्र के निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए उन्हें उर्दू अदब का अमर हस्ताक्षर बताया।



