HomeArt & Cultureछपरा में अमन-चैन की गूंज: 29वाँ इप्टा सम्मेलन चार सत्रों में सम्पन्न

छपरा में अमन-चैन की गूंज: 29वाँ इप्टा सम्मेलन चार सत्रों में सम्पन्न

छपरा। भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा), छपरा द्वारा बिपिन बिहारी श्रीवास्तव नगर, ब्रजकिशोर किंडर गार्टन, छपरा में रविवार को 29वाँ इप्टा छपरा सम्मेलन सह लोक रंगोत्सव चार सत्रों में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में कला, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों का समन्वय देखने को मिला, जहाँ युद्ध के खिलाफ शांति और मानवीय मूल्यों का संदेश प्रमुख रूप से उभरा।

सम्मेलन की शुरुआत सर्वप्रथम विधान पार्षद प्रो० वीरेन्द्र नारायण यादव एवं इप्टा बिहार के महासचिव डॉ० फ़ीरोज़ अशरफ़ खाँ द्वारा झंडोत्तोलन से हुई। इसके पश्चात प्रो० वीरेन्द्र नारायण यादव, डॉ० फ़ीरोज़ अशरफ़ खाँ, बिहार इप्टा के उपाध्यक्ष रमेश यादव एवं संयुक्त सचिव पीयूष सिंह ने दीप प्रज्वलित कर सम्मेलन का विधिवत उद्घाटन किया।

विचार गोष्ठी में गंभीर विमर्श

दूसरे सत्र में “युद्ध: शान्ति की संस्कृति बनाम हिंसा की राजनीति” विषय पर सार्थक विचार गोष्ठी आयोजित की गई, जिसका विषय प्रवेश डॉ० अमित रंजन ने करते हुए कहा कि “मानव सभ्यता का इतिहास जितना विकास का है, उतना ही युद्धों की त्रासदी का भी रहा है। आज आवश्यकता है कि हम शांति की संस्कृति को सामाजिक आंदोलन के रूप में स्थापित करें।”

शोधार्थी कौस्तुभ निहाल ने कहा कि “वर्तमान दौर में युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आर्थिक और वैचारिक वर्चस्व का माध्यम बन चुका है।”
डॉ० दीनेश पाल ने युद्ध को मानवता के लिए सबसे बड़ा संकट बताते हुए कहा कि “हिंसा की राजनीति समाज को विभाजित करती है, जबकि संस्कृति उसे जोड़ती है।”

प्रो० विभु कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि “कला और साहित्य हमेशा शांति के पक्षधर रहे हैं और इन्हें जनमानस तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है।”

डॉ० लाल बाबू यादव ने ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से बताया कि “हर युद्ध के बाद सबसे अधिक नुकसान आम जनता को उठाना पड़ता है।”

पीयूष सिंह ने कहा कि “आज जरूरत है कि युवाओं को शांति और सह-अस्तित्व की विचारधारा से जोड़ा जाए।”
राजेन्द्र राय ने कहा कि “हिंसा की राजनीति लोकतंत्र के मूल्यों के लिए खतरा है और इसके खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिरोध जरूरी है।”

डॉ० फ़ीरोज़ अशरफ़ खाँ ने कहा कि “इप्टा की परंपरा हमेशा जनपक्षधर रही है और यह संगठन कला के माध्यम से सामाजिक बदलाव का वाहक है।”

राम बाबू सिंह ने अपने विचार रखते हुए कहा कि “लोक संस्कृति में शांति और सहिष्णुता के तत्व गहराई से निहित हैं, जिन्हें मजबूत करने की आवश्यकता है।”

प्रो० वीरेन्द्र नारायण यादव ने कहा कि “शांति केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता के आधार पर ही संभव है।”

विचार गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए सुरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि “संस्कृति का दायित्व है कि वह सत्ता की हिंसक प्रवृत्तियों के विरुद्ध जनचेतना को जागृत करे और शांति की दिशा में समाज को प्रेरित करे।”

सांगठनिक सत्र और नई कार्यकारिणी का गठन

तीसरे सत्र में आयोजित सांगठनिक बैठक में संयोजक शैलेन्द्र कुमार शाही ने प्रतिवेदन प्रस्तुत किया, जिसे बहस के दौरान प्राप्त सुझावों के आधार पर आंशिक संशोधन के साथ सर्वसम्मति से पारित किया गया। इसी सत्र में नई कार्यकारिणी का गठन भी सर्वसम्मति से किया गया।

नई कार्यकारिणी में मुख्य संरक्षक के रूप में प्रो० वीरेन्द्र नारायण यादव तथा संरक्षक मंडल में प्रो० लाल बाबू यादव, प्रो० विभु कुमार, डॉ० शालिग्राम विश्वकर्मा, प्रो० कंचन माला, डॉ० नेहा पाण्डेय, प्रो० विद्या वाचस्पति त्रिपाठी एवं सच्चिदानन्द प्रसाद का निर्वाचन हुआ।

दस पदाधिकारियों में अध्यक्ष सुरेन्द्र नाथ त्रिपाठी, कार्यकारी अध्यक्ष डॉ० अमित रंजन, उपाध्यक्ष प्रियंका कुमारी, विनय कुमार एवं बबुआनन्द द्विवेदी सचिव शैलेन्द्र कुमार शाही, संयुक्त सचिव रंजीत भोजपुरिया, सहायक सचिव विजय शंकर एवं शालिनी कुमारी तथा कोषाध्यक्ष सत्येन्द्र सिंह निर्वाचित हुए।

इसके अतिरिक्त 11 सदस्यीय कार्यकारिणी में कंचन बाला, डॉ० अंजलि सिंह, प्रियंका श्रीवास्तव, अमितेश, जय प्रकाश माँझी, जितेन्द्र कुमार राम, प्रिया श्रीवास्तव, सुग्रीव गुप्ता, आकाश सिंह एवं डॉ० रविन्द्र सिंह निर्वाचित हुए जबकि एक पद रिक्त रखा गया।

सम्मेलन के समापन अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि इप्टा जैसे सांस्कृतिक संगठन समाज में शांति, समानता और जनवादी मूल्यों के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और ऐसे आयोजन समय की जरूरत हैं।

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