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“जान दे दें, बिहार वाले हैं…” जब समीर परिमल का कलाम कविता से आगे बढ़कर सामूहिक अस्मिता का घोष बन गया

जब शायरी ईमानदार होती है और शायर अपने समय से आँख मिलाकर बात करता है, तब एक शेर भी इतिहास का दस्तावेज़ बन सकता है। और शायद इसी लिए— “जान दे दें, बिहार वाले हैं…” बीती रात सिर्फ़ पढ़ा नहीं गया, पूरी महफ़िल ने उसे जी लिया।

छपरा, 22 जनवरी 2026। छपरा के हथुआ मार्केट में देर शाम सजी अदब की महफ़िल किसी औपचारिक कवि सम्मेलन तक सीमित नहीं रही। यह वह शाम थी जब कविता ने अपने समय से सीधा संवाद किया और शेरों ने जनमानस की सुप्त चेतना को आवाज़ दी। मुशायरे के केंद्र में रहे डिप्टी टैक्स कमिश्नर बिहार और प्रख्यात शायर समीर परिमल, जिनके शेरों ने महफ़िल को केवल तालियों से नहीं, बल्कि आत्मगौरव की ऊर्जा से भर दिया।
जब समीर परिमल ने पढ़ा—
“इश्क़ वाले हैं, प्यार वाले हैं
हम खिजां में बहार वाले हैं
मुस्कुरा कर जो देखिए हमको
जान दे दें, बिहार वाले हैं”
तो यह महज़ रूमानी अभिव्यक्ति नहीं रही। इस शेर में मुस्कान के पीछे छिपे संघर्ष और सहनशीलता में पलते स्वाभिमान की स्पष्ट झलक थी। भाव यह संकेत दे गया कि बिहार की पहचान आक्रोश से नहीं, बल्कि संयम और साहस के संतुलन से बनती है—जहाँ ज़रूरत पड़े तो मुस्कुराते हुए भी जान देने का हौसला मौजूद है। यह शेर बिहार को केवल पीड़ा और पिछड़ेपन के चश्मे से देखने वाली दृष्टि पर करारा प्रहार करता है और बताता है कि अभावों की खिजां में भी इस धरती ने संस्कृति, प्रेम और रचनात्मकता की बहार को जीवित रखा है।

समीर परिमल की शायरी की विशिष्टता यही रही‌ है कि उसमें फकीरी भी है और फ़ख़्र भी। जब उन्होंने कहा—
“कमतर न समझ लेना परिमल की फकीरी को,
इक वोट के दम पर हम सरकार बदलते हैं”
तो यह शेर लोकतंत्र की असली ताक़त की याद दिलाता है। यहाँ फकीरी लाचारी नहीं, बल्कि जनशक्ति से उपजा आत्मविश्वास है। शेर स्पष्ट संकेत देता है कि सत्ता का असली स्रोत जनता है—और जनमानस  इस सच को भली-भांति जानता है।

मुशायरे में युवा कवि अस्तित्व अंकुर ने अपनी तीखी और संवेदनशील नज़्मों से श्रोताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। उनकी पंक्तियाँ—
“जबां सच बात कहने से मुकर जाए तो मर जाना,
कमी किरदार में अपने नज़र आए तो मर जाना”
ने गहरी छाप छोड़ी। वहीं उनका शेर—
“यहाँ से होके तरक़्क़ी गुज़रने वाली है,
वो रास्ते में जो इक पेड़ था, कटा कि नहीं”
सामाजिक सरोकारों को बेहद प्रभावी ढंग से सामने लाया।

कवि आशुतोष द्विवेदी की पंक्तियाँ—
“याद बहुत आती है मुझको,
छोड़ के जाने वाली लड़की”
ने महफ़िल को एक क्षण के लिए भीतर की दुनिया में ले जाकर खड़ा कर दिया।

डॉ. अमित रंजन ने जब पढ़ा—
“हिचकियां आईं तो मैंने उठकर पानी पी लिया,
अब किसी के याद करने का भरम छोड़ दिया”
तो श्रोताओं ने खूब सराहना की। वहीं उनकी ग़ज़ल—
“मेरी आँखों में तुम नहीं, नमी है,
वजह तुम नहीं, तुम्हारी कमी है”
ने माहौल को रुमानी बना दिया।

अदब की महफ़िल सजने की वजह बनी प्रसिद्ध व्यवसायी, समाज सेवी और शायर सैयद कैसर हसन बबलू राही के नये प्रतिष्ठान तंजेब कुर्ता महल का उद्घाटन, कार्यक्रम के दौरान डिप्टी टैक्स कमिश्नर समीर परिमल ने बबलू राही के नए प्रतिष्ठान ‘तंजेब कुर्ता महल’ का उद्घाटन भी किया।

कवि सम्मेलन और मुशायरे में अध्यक्षता कर रहे दक्ष निरंजन शंभु, हंसमुख, कविन्द्र कुमार सहित अन्य रचनाकारों ने भी अपने कलाम प्रस्तुत किए।
कवि सम्मेलन का सधा हुआ और प्रभावशाली संचालन सुहैल अहमद हाशमी ने किया।

पूरी महफ़िल का मिज़ाज इस बात का साक्ष्य रहा कि यह आयोजन केवल साहित्यिक मनोरंजन नहीं, बल्कि संवेदना, अस्मिता और लोकतांत्रिक चेतना का सार्वजनिक संवाद था। यहाँ शेरों ने आईना दिखाया, दाद ने समर्थन दिया और श्रोताओं ने कविता में खुद को पहचाना।

हथुआ मार्केट की यह शाम इस बात की गवाही बन गई कि जब शायरी ईमानदार होती है और शायर अपने समय से आँख मिलाकर बात करता है, तब एक शेर भी इतिहास का दस्तावेज़ बन सकता है।
और शायद इसी लिए—
“जान दे दें, बिहार वाले हैं…”
बीती रात सिर्फ़ पढ़ा नहीं गया, पूरी महफ़िल ने उसे जी लिया।

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