किसी राष्ट्र जीवन के प्रवाह में साल का बदलना कैलेंडर बदलने से ज्यादा कुछ नहीं होता। किंतु नए साल पर हम व्यक्ति और समाज के तौर कुछ संकल्प लेते ही हैं। नया साल हमें विहंगावलोकन का अवसर देता है और आगे क्या करना है इसका मार्ग भी दिखाता है। 2026 ऐसा ही एक साल है, जिसने हमें यह अवसर दिया है कि हम अपनी चुनौतियों को पहचानें और सपनों में रंग भरने के लिए आगे आएं। युवा देश होने के नाते अगर यह अवसरों का जनतंत्र है तो आकांक्षाओं का समुद्र भी लहलहा रहा है। लोग आगे बढ़ना चाहते हैं और अच्छी जिंदगी जीना चाहते हैं। यह संकट किसी भी समाज के संकट हो सकते हैं किंतु भारत को इससे जूझकर ही आगे बढ़ने का मार्ग मिलेगा।
रोजगार सृजन की गुणवत्ता-
भारत की युवा आबादी के सपने बहुत बड़े हैं। वे अच्छा रोजगार चाहते हैं।अस्थायी कम वेतन वाली नौकरियां समाज में असंतोष का ही कारण बनती हैं। गिग इकोनामी, कान्ट्रैक्ट वर्क और आटोमेशन के दौर में युवाओं का संकट गहरा किया है। देश में शिक्षा केंद्र बढ़ें हैं किंतु मुद्दा यह है कि क्या युवाओं को वहां शिक्षा मिल रही है। वे कौशल से युक्त हो रहे हैं या सिर्फ डिग्री उनके लिए बोझ बन रही है। ‘उद्योगों के लिए तैयार युवा’ कहां हैं। शिक्षा प्रणाली यह विवशता अभी खत्म होती नहीं दिखती। पाठ्यक्रम, प्रशिक्षण और उद्योग के बीच लंबी प्रतीक्षा आज भी बनी हुई है। ऐसे में डिग्रीधारी बेरोजगार इस देश की सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं। बने रहेंगें।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उपजे संकट-
एआई, मशीन लर्निंग और आटोमेशन हमारे जैसे बहुत बड़ी आबादी वाले समाज के लिए संकट भी है और अवसर भी। तकनीक से बढ़ती उत्पादकता और सक्षम मशीनें अंततः मनुष्य को हाशिए पर लगा रही हैं। बहुत सारा वर्कफोर्स बेमानी होने के आसार हैं। पारंपरिक कामों और नौकरियों पर खतरे के गहरे बादल हैं। कई जगह ये प्रारंभ भी हो गया है। इस साल हमें यह तय करना होगा कि हम सारा कुछ बाजार की शक्तियों के हवाले कर देंगे या अपेक्षित संवेदना के साथ मानवीय आवश्यक्ता के साथ संतुलन बनाएंगें।
कृषि संकट और ग्रामीण भारत-
पिछले अनेक सालों में नगर केंद्रित विकास के प्रयोगों ने हमारे शहरों को नरक और गांवों को खाली कर दिया। गांधी का ग्राम स्वराज्य का स्वप्न हाशिए पर लगा दिया गया। भारत माता ग्रामवासिनी सिर्फ गीतों का स्वर रह गया। उजड़ते गांवों ने ऐसी कथा लिखी है जिससे कहकर- सुनकर दर्द बढ़ता ही है। बावजूद इसके हमारी आधी से अधिक आबादी की निर्भरता आज भी खेती पर है। जलवायु परिर्वतन, बढ़ती लागत, न्यूनतम समर्थन मूल्य की अनिश्चितता और बाजार की अस्थिरता ने किसानों को गहरे संकट में डाल रखा है। खेती की उपज के मूल्य का अंतर किसान और बाजार के बीच कितना है,यह देखना जरूरी है। कृषि सुधार के अनेक प्रयासों के बाद भी खेती लाभ का व्यवसाय नहीं बन पा रही है। ऐसे में नई पीढ़ी खेती करने से दूर जा रही है और किसानों की जेब और आत्मसम्मान दोनों संकट में हैं।
इसके साथ ही जल संकट और पर्यावरण का सवाल हमारी बड़ी चुनौती है। महानगरों की फिजाओं में घुलता जहर हमने देखा है। इससे हमारी राष्ट्रीय राजधानी भी मुक्त नहीं है।कई राज्य गंभीर भूजल संकट से जूझ रहे हैं। अनियमित मानसून, प्रदूषण और अंधाधुंध शहरीकरण ने पर्यावरण संतुलन को चौपट कर दिया है। जल,जंगल और जमीन के सवाल हमें देर तक और दूर तक परेशान करते रहेंगें। इसके चलते समाज में गहरा असंतोष पैदा हो रहा है। नए साल में इन सवालों को संबोधित करने की जरूरत है।
स्वास्थ्य व्यवस्था का संकट-
कोविड संकट ने हमें आईना दिखाया था कि हमारी स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल क्या है। उससे उबर कर हमने बहुत कुछ सीखा और खुद को कई मामलों में आत्मनिर्भर बनाया। स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर शहर और गांव का खांई और भी गहरी होती जा रही है। आयुष्मान योजना जैसे प्रकल्प भी लगता है कि निजी क्षेत्र की लूट का कारण बन गए हैं। आयुष्मान और बीमा धारकों की हैसियत को देखकर इलाज करने वाले अस्पताल भी खड़े हो गए हैं। रोग के बजाए मरीज तलाशे जा रहे हैं। स्वास्थ्य सुविधा देने वाले कुछ लोग कई मायने में अमानवीयता की हदें पार कर रहे हैं। निजी सेवाएं महंगी होते जाने से सरकारी तंत्र पर दबाव बहुत बढ़ गया है। सरकारी अस्पतालों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं है किंतु सर्वाधिक मरीज उन्हीं के पास हैं। ऐसे में भारत का मध्यवर्ग गहरे संकट का शिकार है। उसकी सुनने वाला कोई नहीं है। महंगाई, शिक्षा-स्वास्थ्य खर्च, ईएमआई, अस्थाई नौकरियां, करों का बोझ मध्यवर्ग के लिए चुनौती है। इससे सामाजिक अस्थिरता और उपभोक्ता अर्थव्यवस्था का संकट संभव है।
राज्यों की वित्तीय चुनौतियां-
लोकलुभावन वायदों को पूरा करने में राज्यों ने अपनी आर्थिक स्थिति चौपट कर ली है। संघीय ढांचा संतुलन और सहयोग की धुरी पर टिका हुआ है किंतु हालात संकटपूर्ण हैं।राज्यों के खस्ताहाल आर्थिक तंत्र, कर वितरण और योजनाओं के क्रियान्यवन से जुड़े संकटों को नए साल में हल करने की जरूरत है। इसके साथ ही भारत की जटिल भौगोलिक संरचना में वह हर तरफ विरोधी विचार के देशों से घिरा है। पाकिस्तान और चीन के बाद अब बांग्लादेश की शांत सीमा से भी संकट बढ़ रहा है। ऐसे में सुरक्षा चुनौतियां बहुत गंभीर हैं। ऐसे में गहरे रणनीतिक संतुलन, कूटनीति और धैर्य की जरूरत दिखती है। नए साल में हमें इन संकटों से दो-चार होना पड़ेगा।
सूचना का शोर और भरोसे का संकट-
Sanjay Speaks: What should be India’s dreams in the New Year? Degree-holding unemployment is the country’s biggest challenge — Prof. Sanjay Dwivedi
मीडिया को चौथा स्तंभ कहकर लोक ने समादृत किया है। किंतु वह गहरे सूचना शोर से जूझ रहा है जहां भरोसे का संकट गहरा हुआ है। फेक न्यूज, प्रौपेगेंडा, एल्गोरिदमिक एजेंडा और टीआरपी संस्कृति ने समूची मीडिया की नैतिकता और समझदारी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।2026 का साल मीडिया के लिए खुद के आत्ममूल्यांकन और आत्मपरिष्कार का साल भी है। इसके साथ ही सोशल मीडिया ने नए संकट खड़े किए हैं। मुख्यधारा का मीडिया भी इससे आक्रांत है। सोशल मीडिया संवाद के बजाए विवाद का मंच बना हुआ है। सामाजिक समरसता और सद्भाव से परे हटकर दी जा रही सूचना और कथाएं हमारे लिए विचार का विषय हैं। इससे हमारी स्वाभाविक सद्भावना खतरे में हैं।
इन संकटों के बीच भी हम तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं। हमें अपने संकटों के हल खुद खोजने होंगें। नया साल वह अवसर है कि हम आत्ममूल्यांकन कर सही दिशा में सामूहिक प्रयत्नों का सिलसिला आगे बढ़ाएं। 2026 हमारे लिए सिर्फ आर्थिक वृद्धि का साल नहीं बल्कि हमारे राष्ट्रीय विवेक, सामाजिक संतुलन और संवेदनशीलता की परीक्षा भी है। अनेक गंभीर चुनौतियों के बाद भी हम नीति,नीयत और ताकतवर नेतृत्व से अपने संकटों का हल कर सकते हैं। आइए अपने भागीरथ हम स्वयं बनें और विकास के साथ करुणा को साधकर एक बार पुनः भारतबोध की यात्रा पर प्रयाण करें।



