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छपरा में बापू के 78वें शहादत दिवस पर श्रद्धा, प्रतिरोध, विचार और संगीत की रागिनी

संगोष्ठी का विषय प्रवेश करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य डॉ. अमित रंजन ने कहा कि “आज का समाज असहिष्णुता के एक गहरे दौर से गुजर रहा है, जहाँ धर्म, जाति और पहचान को राजनीति का औज़ार बनाया जा रहा है। ऐसे समय में गांधी का सर्वधर्म सद्भाव केवल सह-अस्तित्व का विचार नहीं, बल्कि सक्रिय नैतिक प्रतिरोध है। गांधी मानते थे कि धर्म मनुष्य को जोड़ने के लिए है, तोड़ने के लिए नहीं। जब धर्म नफ़रत की भाषा बोलने लगे, तब गांधी का सत्याग्रह उस नफ़रत के विरुद्ध सबसे सशक्त उत्तर बनता है। आज सर्वधर्म सद्भाव का अर्थ है—हर प्रकार की सत्ता-प्रायोजित घृणा के सामने निर्भीक होकर खड़ा होना और संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा की रक्षा करना।”

छपरा 30.01.2026। भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा), छपरा द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के 78वें शहादत दिवस के अवसर पर “हे राम… बापू को बिहारी जन का सलाम” का किया गया जिसके दूसरे चरण में इप्टा छपरा द्वारा अपराह्न 4 बजे से मंज़र रिज़वी भवन में ‘आधुनिक संदर्भों में गांधी दर्शन की प्रासंगिकता’ विषय पर विचार संगोष्ठी एवं बापू के प्रिय भजनों की प्रस्तुति हुई। संगोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने की, जबकि संचालन अधिवक्ता शैलेन्द्र कुमार शाही ने किया।

संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए भाकपा बिहार सचिव मण्डल सदस्य सुरेन्द्र सौरभ ने कहा कि आज देश और समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती साम्प्रदायिक वैमनस्य है, जिसे योजनाबद्ध तरीके से राजनीति और सत्ता के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। धर्म को नफ़रत का माध्यम बनाकर आम लोगों के बीच अविश्वास, भय और हिंसा का माहौल खड़ा किया जा रहा है। यह न केवल संविधान की आत्मा के खिलाफ है, बल्कि हमारी साझा संस्कृति और गंगा-जमुनी तहज़ीब पर सीधा हमला है।

संगोष्ठी का विषय प्रवेश करते हुए इप्टा के राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य डॉ. अमित रंजन ने कहा कि “आज का समाज असहिष्णुता के एक गहरे दौर से गुजर रहा है, जहाँ धर्म, जाति और पहचान को राजनीति का औज़ार बनाया जा रहा है। ऐसे समय में गांधी का सर्वधर्म सद्भाव केवल सह-अस्तित्व का विचार नहीं, बल्कि सक्रिय नैतिक प्रतिरोध है। गांधी मानते थे कि धर्म मनुष्य को जोड़ने के लिए है, तोड़ने के लिए नहीं। जब धर्म नफ़रत की भाषा बोलने लगे, तब गांधी का सत्याग्रह उस नफ़रत के विरुद्ध सबसे सशक्त उत्तर बनता है। आज सर्वधर्म सद्भाव का अर्थ है—हर प्रकार की सत्ता-प्रायोजित घृणा के सामने निर्भीक होकर खड़ा होना और संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा की रक्षा करना।”

मुख्य वक्ता शिक्षक नेता चुल्हन‌ प्रसाद सिंह ने कहा कि गांधी दर्शन मूलतः मानव-केंद्रित विकास का दर्शन है। आधुनिकता ने विकास को उत्पादन, उपभोग और मुनाफ़े के गणित में बदल दिया है, जबकि गांधी ने विकास को नैतिकता, आत्मसंयम और सामाजिक न्याय से जोड़ा। आज जब आधुनिक समाज असमानता, पर्यावरण संकट और सामाजिक विघटन से जूझ रहा है, तब गांधी का “ज़रूरत बनाम लालच” का सिद्धांत और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। तकनीक ने मनुष्य की क्षमता बढ़ाई है, लेकिन संवेदना घटाई है। सोशल मीडिया के इस दौर में संवाद बढ़ा है, पर सहिष्णुता घटी है। गांधी का सत्याग्रह केवल राजनीतिक प्रतिरोध नहीं था—वह संवाद की सर्वोच्च नैतिक विधा थी। आज, जब असहमति को देशद्रोह और प्रश्न को अपराध समझा जाने लगा है, तब गांधी का अहिंसक विरोध लोकतंत्र की रक्षा का सबसे प्रासंगिक औज़ार बन जाता है।

संचालन करते हुए शैलेन्द्र कुमार शाही ने कहा कि “गांधी दर्शन किसी एक दिवस का स्मरण नहीं, बल्कि निरंतर आत्ममंथन और सामाजिक हस्तक्षेप की मांग करता है। जब तक हम उसे अपने पेशे और सार्वजनिक जीवन में नहीं अपनाते, तब तक गांधी अधूरे रहेंगे।”

अध्यक्षीय भाषण में वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा कि “वर्तमान राजनीतिक परिवेश में गांधी दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। जब सत्ता का उद्देश्य सेवा से हटकर वर्चस्व बन जाए, तब गांधी का सत्य, अहिंसा और नैतिक राजनीति का विचार एक चुनौती के रूप में सामने आता है। गांधी ने राजनीति को नैतिकता से जोड़ा था, जबकि आज नैतिकता को राजनीति से बाहर किया जा रहा है।

संगोष्ठी अधिवक्ता निर्मल कुमार श्रीवास्तव, अधिवक्ता बबुआनन्द द्विवेदी, अधिवक्ता देवेन्द्र कुमार सिंह, अधिवक्ता त्रिविक्रम दुबे, किसान नेता, रामबाबू सिंह, सुग्रीव गुप्ता, डॉ० रवींद्र प्रसाद आदि ने भी गांधी के विचारों को सामाजिक सौहार्द और लोकतांत्रिक मूल्यों से जोड़ते हुए अपने विचार रखे।

अंत में शिक्षिका प्रियंका कुमारी ने गाँधी जी के प्रिय भजनों वैष्णव जन तो तेने कहिए जी, रघुपति राघव राजा राम और तू ही राम है तू रहीम है… की भावप्रवण सांगीतिक प्रस्तुति दी।

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