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इप्टा की गूँज: ‘कोर्ट मार्शल’ ने प्रेमचंद रंगशाला में समाज के अंतर्विरोधों को किया बेनकाब

निर्देशक तनवीर अख्तर ने नाटक के मर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा: ​"हमारा उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि दर्शकों को उस कड़वे सच से रूबरू कराना है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। 'कोर्ट मार्शल' के माध्यम से हमने यह दिखाने का प्रयास किया है कि मानवीय गरिमा और समानता के सवाल किसी भी अनुशासन से ऊपर हैं। रंगमंच समाज का वह आईना है जहाँ सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।"

 पटना  10 मार्च, 2026। राजधानी पटना की सांस्कृतिक फिजां में आज भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) ने अपनी प्रतिबद्धता और कलात्मक कौशल का लोहा मनवाया। सुप्रसिद्ध नाटककार स्वदेश दीपक द्वारा रचित कालजयी नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ का भव्य मंचन प्रेमचंद रंगशाला में किया गया। प्रख्यात रंगकर्मी तनवीर अख्तर के कुशल निर्देशन में सजी इस प्रस्तुति ने न केवल तालियाँ बटोरीं, बल्कि दर्शकों को अंत तक बाँधे रखा और गहरे सवाल भी खड़े किए।

अनुशासन की वर्दी और समाज की जकड़न

​’कोर्ट मार्शल’ महज़ एक सैन्य प्रक्रिया की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन अदृश्य दीवारों की पड़ताल है जिन्हें हमारा समाज सदियों से ढो रहा है। नाटक की पृष्ठभूमि सेना है, जहाँ अनुशासन सर्वोपरि होता है, लेकिन एक सैनिक के कोर्ट मार्शल के दौरान धीरे-धीरे यह उजागर होता है कि सेना के भीतर भी जातिवाद, ऊँच-नीच और भेदभाव की कुरीतियों ने अपनी जगह बना रखी है। नाटक के माध्यम से यह कड़वा सच सामने आया कि कोई भी संस्थान समाज से अलग नहीं हो सकता; समाज में व्याप्त विसंगतियाँ वर्दी के भीतर भी उसी तीव्रता से मौजूद रहती हैं।

निर्देशक का वक्तव्य

​मंचन के उपरांत निर्देशक तनवीर अख्तर ने नाटक के मर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा:

“हमारा उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि दर्शकों को उस कड़वे सच से रूबरू कराना है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। ‘कोर्ट मार्शल’ के माध्यम से हमने यह दिखाने का प्रयास किया है कि मानवीय गरिमा और समानता के सवाल किसी भी अनुशासन से ऊपर हैं। रंगमंच समाज का वह आईना है जहाँ सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।”

 

मंच पर जीवंत हुआ हर किरदार

​नाटक की सफलता का मुख्य श्रेय कलाकारों के सधे हुए अभिनय को जाता है। श्रीकांत किशोर ने कर्नल सूरत सिंह की भूमिका में एक सशक्त सैन्य अधिकारी की छवि प्रस्तुत की, जो अनुशासन और न्याय के बीच संतुलन बनाए रखता है। वहीं, मेजर अजय पुरी के रूप में सुनील किशोर ने अपने अभिनय में जो गंभीरता और ठहराव दिखाया, वह काबिले तारीफ था।

​वैचारिक पक्ष को मजबूती देने का काम जावेद अख्तर खां ने किया, जिन्होंने कैप्टन विकास रॉय के किरदार के माध्यम से तर्कों को प्रभावी ढंग से रखा। विशेष रूप से पीयूष सिंह का उल्लेख करना अनिवार्य है; ‘सवार रामचंद्र’ के रूप में उनके मर्मस्पर्शी अभिनय ने पूरे सभागार को भावुक कर दिया। इनके साथ ही अभिषेक शर्मा, शाकिब खान, सौरभ कुमार और विशाल तिवारी ने भी अपने-अपने किरदारों को पूरी ईमानदारी के साथ निभाया।

दर्शकों की प्रतिक्रिया: “दिल को छू गई प्रस्तुति”

​मंचन के दौरान कई ऐसे क्षण आए जब सभागार में गहरी खामोशी छा गई। नाटक खत्म होने के बाद दर्शकों की लंबी तालियों ने कलाकारों का अभिनंदन किया। एक दर्शक ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “यह नाटक हमें झकझोर देता है। समाज में व्याप्त भेदभाव को जिस तरह सेना की पृष्ठभूमि में दिखाया गया, उसने अंतरात्मा को छू लिया।” वहीं युवाओं का कहना था कि ऐसे नाटक उन्हें समाज के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं।

युवाओं की भागीदारी और कल का मंचन

​इस प्रस्तुति की सबसे उल्लेखनीय विशेषता रही दर्शकों की दीर्घा में युवाओं की भारी भीड़, जो एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज के लिए शुभ संकेत है। इप्टा पटना की ओर से यह जानकारी दी गई है कि इस महत्वपूर्ण नाटक का दूसरा मंचन कल, 11 मार्च 2026 की शाम को पुनः प्रेमचंद रंगशाला में किया जाएगा। इप्टा ने सभी रंगप्रेमियों से इस संवाद का हिस्सा बनने की अपील की है।

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